पेन्सिल कैक्टस

नमस्कार दोस्तों!
आज जिस पौधे से हम दोस्ती करने वाले हैं उसका नाम है पेंसिल कैक्टस हालांकि इसमें न तो पेंसिल उगती है और न ये कैक्टस है। पर इसकी हरी डालें लगभग पेंसिल जैसी मोटाई और लंबाई की होती हैं और आमतौर पर हमारी आदत होती है कि जिस भी पौधे में पत्तियां नहीं होतीं या लगभग नहीं के बराबर होती हैं उसे कैक्टस ही समझते हैं इसलिए आम बोलचाल में इसे पेंसिल कैक्टस कहते हैं।
इस पौधे की देखरेख बहुत ही आसान है और अगर आप बाग़वानी सीखने के बिल्कुल शुरूआती दौर में हैं तो भी आप इस पौधे को बड़े आराम से लगा सकते हैं। इसकी आड़ी-टेढ़ी डंडियां देखने में किसी ज्योमेट्रिक डिज़ाइन जैसी बड़ी सुंदर लगती हैं तो इस पौधे को आप जहां भी रखेंगे उस जगह को ये खूब सुंदर और ज़िंदा बना देगा। सर्दी के मौसम में ये और भी सुंदर दिखता है क्योंकि कम तापमान में इसकी डालों का ऊपरी सिरा हल्का नारंगीपन लिए हुए लाल सा हो जाता है और इसीलिए इसको फायर स्टिक प्लांट भी कहते हैं।
यह पौधा असल में यूफोर्बिया प्रजाति का सदस्य है और सक्यूलेंट है। इसलिए इसको अच्छी खासी धूप की दरकार होती है तो अगर आपके घर में कोई ऐसी जगह है जहां कम से कम चार से छः घंटों की धूप आती हो तभी इस पौधे को लगाइए। अगर ऐसी कोई खुली जगह नहीं है तो इसे पूरब या दक्षिण की ओर खुलने वाली खिड़की के सामने भी रख सकते हैं। बिल्कुल छाया या अंधेरे वाली जगह ये बिल्कुल पसंद नहीं करते और अगर आप इन्हें ऐसी किसी जगह पर रख देंगे तो इनकी डालें पीली पड़कर गिरना शुरू कर देंगी और आखिर में पौधा अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। जब सर्दी ज्यादा हो और तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला गया हो या फिर पाला पड़ने की संभावना हो तो इसे खुले आसमान के नीचे से हटाकर उजाले वाली जगह में छाया में रखिए।
पानी इन्हें बहुत कम लगता है। औसत भारतीय जलवायु के हिसाब से गर्मी में हफ्ते में एक बार और सर्दी में 10-15 दिन में एक बार पानी देने से इनका काम चल जाएगा। इसलिए अगर आप रोज़-रोज़ पानी देने के लिए समय न निकाल सकें तो ये पौधा आपके लिए एकदम माकूल है। गमले की मिट्टी जब पूरी तरह से सूख जाए तभी आप इन्हें पानी दीजिए।
ये भी ध्यान रखिए कि ऐसी ज़मीन या मिट्टी में इन्हें लगाइए जिसमें पानी जमा न रहता हो। रेतीली मिट्टी में ये खुश रहते हैं। अगर आपके पास चिकनी मिट्टी है तो उसमें अलग से थोड़ी रेत मिलाकर इनके लिए मिट्टी तैयार कर लीजिए। अगर गमले में इसे लगाना हो तो बिल्कुल ध्यान रखिए कि उसमें नीचे पानी निकलने के लिए छेद ज़रूर हो। घर के अंदर किसी धातु के बर्तन में लगा रहे हों जिसमें छेद न हो तो गमले सहित इसको उठाकर उस पॉट के अंदर रख देना है पर किसी भी हाल में इस पौधे की मिट्टी में कीचड़ जैसी स्थिति नहीं बनने देनी है क्योंकि उस केस में पौधे की जड़ें सड़ जाएंगी और पौधा मर जाएगा।
बहुत उपजाऊ मिट्टी इन्हें नहीं चाहिए इसलिए खाद की भी खास ज़रूरत इन्हें नहीं होती। चाहें तो साल में एक बार सर्दी खतम होने के बाद बसंत के मौसम में थोड़ी खाद दे सकते हैं क्योंकि ये पौधे की नई ग्रोथ का समय होता है।
कीड़े-मकोड़े और बीमारियां भी इनमें नहीं के बराबर होते हैं। फिर भी बारिश के मौसम में स्पाइडर माइट्स या मीली बग जैसे कीट अगर नज़र आ रहे हैं तो नीम के तेल का छिड़काव कीजिए या साबुन के पानी से अच्छी तरह धो दीजिए।
इनके नए पौधे लगाना भी बहुत आसान है। एक ठीक मोटाई की स्वस्थ डाल को किसी तेज़ धार वाले चाकू से काट लीजिए और करीब दस दिन के लिए ऐसे ही छोड़ दीजिए जिससे कट वाली जगह सूख कर कठोर हो जाए और फिर इसे थोड़ी नम ज़मीन में गाड़ दीजिए। कुछ दिनों बाद उसमें नई जड़ें आ जाएंगी और आपके पास नया पौधा तैयार हो जाएगा। आप चाहें तो इस कटिंग को जड़ निकलने तक पानी में भी रख सकते हैं। इसके लिए किसी भी खाली बोतल में इसकी कटिंग रख देनी है। कुछ ही दिनों में आपको नई जड़ें निकलती हुई दिखाई देंगी। जब जड़ें ठीक से निकल आएं तो इसे मिट्टी में रोप दीजिए।
अपने प्राकृतिक परिवेश में ये बहुत बड़े-बड़े पेड़ होते हैं और इनकी लंबाई 30 फीट तक होती है। जी हां! घरों में गमले में भी ये आराम से 6-7 फीट तक लंबे हो जाते हैं पर अपने मनचाहे आकार-प्रकार और लंबाई-चैड़ाई दुरूस्त करने के लिए साल में एक बार बसंत के मौसम में इनकी डालों को छांट सकते हैं जिससे ये छोटे, घने और आकर्षक बने रहेंगे।
इन्हें हैंडल करने से पहले एक बात जो आपको जानना ज़रूरी है वो ये कि इसके अंदर से यूफोर्बिया परिवार के और सदस्यों की तरह ही सफेद दूध जैसा चिपचिपा सा रस निकलता है जो ज़हरीला होता है। तो इन्हें अपने बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर ही रखें और जब भी इसकी प्रूनिंग करनी हो या नया पौधा बनाने के लिए कटिंग निकालनी हो या गमला बदलना हो तो एहतियात के तौर पर हमेशा दस्ताने पहनकर ही इनके साथ पेश आइए क्योंकि इनका रस लगने से त्वचा में जलन और इरिटेशन हो सकता है स्किन लाल भी पड़ सकती है। आंखों में लगने से भी जलन और परेशानी हो सकती है। फिर भी अगर ग़लती से कहीं ये रस छू ही जाए तो एलोवेरा का रस उस जगह पर लगा लीजिए जल्दी आराम मिल जाएगा।
तो दोस्तों ये था आज का हमारा खूबसूरत और सरल सहज सा पौधा। इसके बारे में आपको और कुछ जानना हो तो कमेंट करके पूछ सकते हैं। और हां अगर इसकी कटिंग चाहिए हो तो कमेंट में अपना पता और फोन नं. लिख भेजिए। पहले पांच लोगों को इसकी कटिंग हम फ्री में सिर्फ पोस्टल चार्ज लेकर भेज देंगें।
अपनी अगली मुलाक़ात में हम एक और सहज-सरल पौधे से जान-पहचान करेंगे। तब तक के लिए नमस्कार!